अपनों से दूरी's image
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मैने देखा है लोगों को बदलते हुए

अपने ही रिश्तों से दूर होते हुए,

जरा सा धन शोहरत मिलते ही,

अपने जन्मदाता से दूर होते हुए,

हम कैसे समाज और सोच में जी रहे

जहां अपनों के लिए कतरा रोशनी

भी मुनासिब नहीं,

उन लरजते होंठो पर चंद सुकून भी

देना मुमकिन नहीं,

अब तो रिश्तों में भी गहरी खाई आई

कोई कैसे अपनों के लिए अपने हुए ।।

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