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“आदमी”

आदमी उम्मीद पर जीता रहा,

हर पल मर मर कर,

फिर भी ना विश्वास डिगा,

अपने सपने में खोया,

चल दिया अंजान राह पर,

रास्ता कितना भी लम्बा हो,

अन्त तो होगा कहीं,

अन्त से शुरुआत होगी,

फिर नयी एक राह पर ।

चल दिया नयी राह पर ।

आदमी की अनादि यात्रा,

सदियों से गतिमान है,

वस्त्र पुराने त्याग,

नव निर्माण का परिणाम है,

ऋतु बदलती, मौसम बदलता,

राहें बदलती, मंजिल नहीं,

अनवरत आदमी चलता,

एक नयी राह पर ।

एक नयी राहपर ।।



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