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तुम प्रेम नहीं कर पाओगे!

ऋतिका 'ऋतु'ऋतिका 'ऋतु' January 19, 2023
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मृदु सरिता के मानस कठोर।

मत जल में होकर के विभोर

जल ही समझो अंतर्मन को।

कर भाव-प्रवाहित स्पंदन को,

क्या पुष्प सदृश झर पाओगे?

तुम प्रेम नहीं कर पाओगे!


तुम भावुक पर गंभीर-मौन।

इस कलकल के तुम कहो कौन?

तुम दूर किसी नर का स्वर हो।

तुम पत्थर ही थे,पत्थर हो।

इस पथ पर क्योंकर आओगे?

तुम प्रेम नहीं कर पाओगे!


--©ऋतिका 'ऋतु'

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