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वक्त देखने में सीधा सादा

मगर फिर भी मुकर जाता है

पिंजरे से मुक्त पंछी

कब हाथ आता है


वक्त भागने में तेज़

मगर फिर भी ठहर जाता है

छूट जाए जो साथ

तो दिल कहां चैन पाता है


वक्त वैसे तो समझदार

मगर फिर भी रूठ जाता है

सीने में जमा दर्द

आँखों से बह ही जाता है

✍️✍️

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