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दिखने में गोल हूं

तृप्त कर दूं आत्मा

ऐसी अनमोल हूं


पकती धीमी आँच पर

सुगंध मेरी सौंधी है

मुंह के अंदर जाते ही

थमे भूख की आँधी है


बासी रहूं या रहूं ताज़ी

ठंडी हूं या रहूं गरम

कैसी भी हो ज़िंदगी

लेकिन मैं

हरदम रहूं नरम

लेकिन मैं

हरदम रहूं नरम

✍️✍️

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