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टूटती हूं कहीं से

तो कहीं से उधड़ जाती हूं

गिरती हूं जब जब

हर बार थोड़ा और

संभल जाती हूं


अटकती हूं कहीं पर

तो कहीं भटक जाती हूं

बिखरती हूं जब जब

हर बार थोड़ा और

सिमट जाती हूं


उलझती हूं कहीं पर

तो कहीं फिसल जाती हूं

फँसती हूं जब जब

हर बार थोड़ा और

निखर जाती हूं


चिटकती हूं कहीं पर

तो कहीं चुभ जाती हूं

जूंझती हूं जब जब

हर बार थोड़ा और

संवर जाती हूं

✍️✍️

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