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कुछ घाव दिखते नहीं 

बस अंदर ही अंदर पलते हैं

दर्द की आंच पर 

दिन रात उबलते हैं


कुछ आंसू गिरते नहीं

बस कंखियों में सिमटते हैं

सिसकियों की ओट में

हर पल सुबकते हैं


कुछ जज़्बात उभरते नहीं

पल दर पल बस ढलते हैं

दिल की चारदीवारियों में

क़ैद हो तड़पते हैं

दिल की चारदीवारियों में

क़ैद हो तड़पते हैं

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