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क्यों आदमी को आदमी से प्यार न रहा 

क्यों यह आशियाना बहार का आबाद न रहा 

खामोशी ही खामोशी छाई है हर तरफ 

बहाया बहुत खून फिर भी सार ना मिला 


लड़ते हैं धर्म पर, जाती पर, नाम पर आदमी के भीतर का शैतान ना गया 

ढाहती हैं इमारतें, जलती है बस्तीइन 

आदमी की मौत का हिसाब ना रहा 


किसी सूखी शाख पर करता है गुल इंतजार 

उसे कोई हरा भरा बाग ना मिला 

पनघट पर उदास आज लौटती है गोरी 

कनाहा के मुरली में राग ना रहा 


सूखा हुआ पुष्प है समाज आज मेरा 

गया था भावरा मगर पराग ना मिला 

क्यों आदमी को आदमी से प्यार न रहा 

क्यों यह आशियाना बहार का आबाद न रहा





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