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ख़्वाबीदा रातें

Rishit ShuklaRishit Shukla March 16, 2022
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न मैं हारा, न तू अब तक जीती थी।
बस ख़्वाबीदा रातें तेरी जुस्तजू में बीतीं थीं।।

मेरे हर एक हर्फ़ पर तेरे लहज़े की महक थी।
जैसे लकीरें भी मेरी, तेरी ही हस्तलेख थी।।

मेरे कासा-ए-चश्म में तिश्नगी तेरी अब तलक थी।
जैसे फ़रमान-ए-अलहदगी में सारी कायनात मुश्तरक थी।।

भूला तुझ में डूब, जहां की रिवाज़-ओ-रीति भी।
वो बदन तेरा था या मालिक की कोई शिल्पकृति थी?

मेरे क़ल्ब-ए-जज़िरे में तेरी माह-रु नदियां अब भी बहतीं थीं।
वो हवाओं की आवाज़ थी या तू कानों में फुसफुसाती थी?

वो आफ़ताब-ए-सहर था या घटाओं में छुपी तेरे तबस्सुम की झलक थी?
यकीं मेरा कर, नूर-ए-बारां तेरी, समा - ता - समक थी।।

ख़ैर, जा चुकी थी तू, लेकिन मेरी हर नब्ज़ में तेरी उपस्थिति थी।
कया बताऊं तुझे, क्या कुछ न मुझ पर बीती थी।।

पर आज कदमों को मेरे, मिली तेरी कोई सड़क थी।
मोजिज़ा कहूं इसे, या कोई इनायती खनक थी?

न मैं हारा, न तू अब तक जीती थी।
बस ख़्वाबीदा रातें तेरी जुस्तजू में बीतीं थीं।।


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