यथार्थ's image
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गिर चुकी है छत पुराने दिनों की

नए दौर के चमकते शामियाने लगे हैं

थोड़े पैसे ज़्यादा कमाने की ख़ातिर

अपनी मिट्टी से लोग दूर जाने लगे हैं


बड़े समझ बैठे हैं जो ख़ुद को ग़ुरूर में

हम छोटों से नज़रें चुराने लगे हैं


फ़र्ज़ की शमा' से डर है जलने का जिनको

हर नातों के दीये बुझाने लगे हैं


जज़्बातों की छतरी भला वो क्यूँ खोलें

मतलब की बारिश में जो नहाने लगे हैं


देख चौराहों पे खिलौने बेचता "भविष्य"

सेठ गाड़ियों के शीशे चढ़ाने लगे हैं


जन्म देकर भूल गए जो परवरिश का ज़िम्मा

उनके बच्चे रामू छोटू कहलाने लगे हैं


नारी काया से निकल हो गए कुछ ऐसे मर्द

कि औरतों पे ही ज़ुल्म ढाने लगे हैं


समय के साथ है बहुत कुछ बदलता

सियासत में बजरंगी, श्री राम आने लगे हैं


ढलती उम्र में भी कहाँ देते हैं साथ बेटे

बुज़ुर्ग हौसलों को लाठी बनाने लगे हैं


             - अभिषेक


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