शे'र : III's image
Share0 Bookmarks 16 Reads0 Likes

कभी जन्नत हुई थीं जो गलियाँ

तेरे क़दमों को छू कर

वीरां सी अब हर तरफ नज़र आती हैं

................................................... 


देते अगर जो साथ सफ़र में

तुम हम-सफ़र बन जाते

देखा जो होता निगाहों में मेरी

तो हम लब ही ना हिलाते

........................................ 


वो एक अरसे से ख़फ़ा हैं

ज़रा सी बात पर

शायद वो जानते नहीं

थोड़ी नोक-झोंक

हमारे रिश्ते का नमक है

................................. 


जब से दूर हुए हैं उनसे

फ़ासलों से डरता हूँ

गर रू-ब-रू ला दे ज़िंदगी उनके

सिमट कर बता दूँ मैं

नज़दीकियाँ क्या होती हैं

...................................


कोशिशें तमाम की

रखूँ तुझ से राब्ता बरक़रार

क़दम चार तेरी जानिब

बढ़ाया भी मैंने लेकिन,

हम-क़दम होना 

था शायद तुम्हें नागवार


      - अभिषेक


No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts