मुक़द्दर's image
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शायद हादसों से,

मेरी आश्नाई है I

हर मोड़ पर, 

मुक़द्दर ने ठोकर खाई है II


था यक़ीं जिस पे,

साथ देगा मेरा I

उस ने ही, 

तोहमत लगाई है II


जाऊँ कहाँ ? 

बैठूँ रू-ब-रू किसके ? 

कि अब तो, 

हर अंजुमन में रुस्वाई है II


ज़ीस्त ही नहीं फ़क़त, 

जो रूठी है मुझसे I

मौत ने भी, 

की बेवफ़ाई है II


न सोचा ख़ुद की बाबत, 

क़द्र सबकी करता रहा I

जुर्म संगीन था,

जिसकी सज़ा पाई है II


    - अभिषेक


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