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बचपन बड़ा सुहाना था

क्या ख़ूब अफ़साना था

पापा के कंधों पे चढ़ना

जी भर, मम्मी को सताना था


बात बात पर, रूठ जाना था

रो रो कर, ज़िद मनवाना था

बिन लोरी, सोना नहीं

खिलौनों के लिए अड़ जाना था


नहाने से, जी चुराना था

बार-बार छिप जाना था

काजल न लगवाने को, 

ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना था


बारिश में भीग, घर आना था

काग़ज़ की नाव चलाना था

गंदा-साफ क्या, पता नहीं

फ़र्श की चीज़ें भी, खाना था


सब से घुल-मिल जाना था

दोस्तों को गले लगाना था

ग़म से न कोई आश्ना

हर लम्हा मुस्कुराना था


ख़ुशियों का, छलकता पैमाना था

सही-ग़लत से अंजाना था

बढ़ती उम्र ने, लूट लिया जो

बचपन, वो अनमोल ख़ज़ाना था


          - अभिषेक

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