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अहद-ए-वफ़ा का फरेबी अन्दाज़

rehankatrawalerehankatrawale July 17, 2022
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बयाँ करना चाहता है कुछ ये मायूस दिल मगर,

मसला ये है दिन के उजाले में कुछ कह नही पाता।


हैरत है के तुम्हारे बिना तो रहना सीख गया हूं मैं,

हैरान हूं के दर्द-ए-ला-दवा के बगैर मैं रह नही पाता।


उसकी बेवफाई को तो सहन कर सकता हूं मैं ग़ालिबन,

एक उसके अहद-ए-वफ़ा के फरेबी अन्दाज़ को मैं सह नही पाता।


करना चाहता हूं कुछ ऐसा जो रहे उसे तमाम उम्र याद,

मेरी कमज़ोरी के तमाशा-ए-इश्क़ मैं कर नही पाता।


हर दिन मरना पड़ता है मुझे कुछ बेरहम यादों को साथ लिए,

मेरी बदकिस्मती के मैं एक ही बार में मर नही पाता।


गम-ए-हिज़्र का ज़हर तो हर रोज़ पीता हूं रेहान,

फ़कत ज़हर-ए-इश्क़ को अब मैं पी नही पाता।


दास्तां कुछ ऐसी है बगैर उसके ज़िंदा तो रह लेता हूं मैं,

हाल कुछ ऐसा है बगैर उसके मैं जी नही पाता।।


- रेहान कटरावाले

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