लगता है कोई भूप हों's image
Poetry1 min read

लगता है कोई भूप हों

Ravindra RajdarRavindra Rajdar October 1, 2021
Share0 Bookmarks 204 Reads1 Likes

जहाँ जाड़े की नरम धुप हो , 

थोड़े से भी न मशरूफ हों।

बैठे रहें दालान में चाय संग,

ऐसे लगता है कोई भूप हों। 


जहाँ भार्या फटकती सूप हो, 

मेरी माँ ही खोलती संदूक हो। 

बैठे रहें दालान में रेडिओ संग, 

ऐसे लगता है कोई भूप हों। 


जहाँ बच्चे भी खेलते खूब हों,

और भाई बहन की कौतुक हो। 

बैठे रहें दालान में किताबों संग,

ऐसे लगता है कोई भूप हों। 


जहाँ बैठें पिता प्रभु रूप हों, 

फूल हों और वहां मधुप हों।

बैठे रहें दालान में फूलों संग,

ऐसे लगता है कोई भूप हों। 


- रविन्द्र राजदार 


No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts