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कुछ बेहतर हुआ !

Ravindra RajdarRavindra Rajdar February 8, 2022
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कुछ बेहतर हुआ ! 



मेरे ऑफिस से लौटते समय टैक्सी स्टैंड पर एक व्यक्ति मज़बूर दिखा, मैंने उसे कुछ पैसे ऑफर किये पर वो लेने से मना कर दिया | वो बोला काम के बदले पैसे लूंगा, भीख देने वाले बहुत मिलते हैं अकाल तो काम देने वालों का है |


मुझे अचानक कुछ अच्छा सुझा और उसको बोला मेरा घर 2 किमी दूर है चलो मेरा लैपटॉप बैग पंहुचा दो वो तैयार हो गया |


हम दोनों पैदल घर पहुंचे और मैंने उसे 2 सौ रुपये दिए | उसके चेहरे पर स्वाभिमान की मुस्कान थी और मेरे अंदर बेरोजगारी के सितम सहते करोड़ों लोंगो का सवाल था | बेरोजगारी सिर्फ रोटी कपड़ा और मकान पर ही चोट नहीं करती सबसे ज्यादा चोट करती है व्यक्ति के स्वाभिमान पर। 


सबसे अच्छी बात ये रही की वो 2 सौ जो टैक्सी को देता वो उस व्यक्ति को दिया और पैदल चल के आया तो भोजन बहुत अच्छा लगा |


सूचनार्थ - मैंने कोई फोटो नहीं खींची और न ही खींचता हूँ | मेरे लिए उस व्यक्ति का स्वभिमान बहुत बड़ा है |


- रविन्द्र राजदार

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