मौन's image
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सब कुछ सफर में ही तो है

शब्दों से गहन 'मौन'

प्रकृति से गहन 'प्रेम'

कुछ भी तो स्थायी नहीं है

प्रेम के अतिरिक्त....

ना ये मिट्टी का लिहाफ...

ना अहंकारी लिहाज़...

फिर भी हैरान है..मनुष्य

फिर भी डरता है...मनुष्य

वह जो कुछ भी साथ नहीं है...

कभी उपर उठ सके तो उठो...

समय भी नहीं है, जगह भी नहीं है

कुछ जो बचा रहेगा...

अदृश्य शक्ति के बाद...

वह 'प्रेम' ही तो है....

खुद तो उठना चाहीये...

रुह के लिए...प्रेम के लिए...


- એકાંતિક

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