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पुरूष भ्रम में जीता है

Rashmi KawalRashmi Kawal May 10, 2022
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स्त्री बिना प्रकृति का परिचय है, व्यर्थ,

नित्य नए सृजन करने में है, सर्मथ,

प्रेम और स्वाभिमान से, जीवन बनाती है सार्थक,

उसे पता है अपने धर्म और संस्कृति का अर्थ,

स्त्री कर्मयोगी है, यही उसकी पहचान है।


उसकी खुद्दारी उसे कभी झुकने नहीं देती,

उसके अंदर की आग, उसे थकने नहीं देती,

नया सफर, न‌‌ई मंजिल फिर एक बार चुनती है,

नित्य नये सपने, फिर एक बार बुनती है,

स्त्री सत्य है, यही उसकी पहचान है।


प्रबल निंदा में भी, सत्य के लिए लर सकती है,

वह अपनी लक्ष्मण रेखा, खुद ही खींच सकती है,

हजारों साल की संस्कृति ढोती है, अपने कंधों पर,

तब कहीं जाकर उतरती है दुनिया के उम्मीदों पर,

स्त्री शक्ति है, यही उसकी पहचान है।


पुरूष भ्रम में जिता है,

उसे लगता है, उसके बिना एक स्त्री अपूर्ण है,

पर वह तो अपने आप में ही पूर्ण होती है,

वह तो चाहती है एक ऐसा हमसफ़र ,

जो उसका साथ उम्र भर दें सके।




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