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पता नहीं कब अभिव्यक्ति आप से तुम पर आ

गयी,

धीरे धीरे मैं उसमें और वो मुझमें समा गई।॥


मैं अकेला चला था राह पर पता नहीं कब वो

मुसाफिर बनके आ गई,

जीवन भर की रोशनी तो नहीं पर वो चार दिन में

ही मेरे जीवन में उजाला छा गई,

पता नहीं कब अभिव्यक्ति........ ॥|


साथ तो वो जीवन भर थी पर पता नहीं एक दिन

मेरे जीवन में केसे उदासी सी छा गई,

बहोत ढूंढा मेने उसको हर जगह पर उस दिन से वो

गुमशुदा सी हो गई।

पता नहीं कब अभिव्यक्ति ....


जब भी आया दुख मेरे जीवन में पता नहीं कब वो

उसे अपना समझ कर दबा गई!

अपनी मौत तो नहीं पर मेरे जनाजे को वो अपनी

सांसे रोक कर टाल गई! !

पता नहीं कब अभिव्यक्ति....


रहने को तो वो घर आज भी है पर पता नहीं कैसे

वो मेंरे जीवन में एक इमारत सी ढ़ा गई,

जब जब मुस्काई वो

अपनी जिंदगी मे तो नहीं पर मेरी जिंदगी में चार

चांद लगा गई! !

पता नहीं कब अभिव्यक्ति ..... ॥


वादे तो खूब किये उसने पर पता नहीं वो एक वादा

केसे भूल गयी,

फिर अचानक से एक दिन वो पानी मे नमक की

तरह घूल गयी,


लेकिन मिलेगे कभी किसी राह पर

तो मैं उससे जरूर पूछूगा कि क्यू तुम ऐसे मेरे

जीवन में अचानक से यादों का कहर बरसा गई॥

पता नहीं कब अभिव्यक्ति आप से तुम पर आ गई,

धीरे धीरे मैं उसमें और वो मुझमें समा गई।॥

पता नहीं कब अभिव्यक्ति.....


Written by:- Ramniwas khichar



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