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रामजी मिश्र "मित्र"

#चाह

ये प्यार की विधाएँ समझे नहीं समझता,

कब अश्रु जल बरसता, कब प्रेम रस सरसता।

अब तो हुआ हूँ बेसुध बिलकुल नहीं सम्हलता,

कब प्यार में भटकता, कब दिल मेरा तड़पता।ये दिल है कि दर्द मंजर जो बढ़ती रही विकलता,

यहाँ दिल नहीं बदलता, वहां वो नहीं बदलता।।

ये कौन सी सजा है वो कौन सी विवशता,

या मैं नहीं समझता, या वो नहीं समझता।।


अब हाय पपिहरा बन बिलख रहा, हर बूँद गिराई इतर उतर।।

मैं बन के चकोरा तड़प रहा, वह मचल रही हर बदली पर।।


पा न सका तुमको पाकर भी, पर मेरा यह अपराध नहीं है।।

फिर भी रिश्तों में श्रेष्ठ तुम्ही हो, कहता मेरा प्रेम यही है।।

तन मन जीवन सब अर्पित कर, याचक बन कुछ माग रहा हूँ।।

बरसा दो वह प्रेम सुधा बदली, जिस हेतु प्रिये मैं तड़प रहा हूँ।।दिखती हो हर पल तुम मुझको, फिर ऐसे क्यों ढूंढ रहा हूँ।। 

यदि मैं निश्चल प्रेम पथिक हूँ, तब कर्तव्यों से विमूढ़ कहाँ हूँ।। अब


जीवन भी बसता तुममे, फिर कैसे मैं जी पाउँगा।। 

अगर तड़प ऐसी ही भोगी तो सावन नहीं बिताऊंगा।। 

तो सावन नहीं बिताऊंगा ........... तो सावन नहीं बिताऊंगा.........






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