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माता का प्रसाद 'घुघरी'

Raksha PandyaRaksha Pandya March 29, 2022
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खेतो में गेहूँ की फसल कटकर घर-आँगन आने के साथ ही चैत्र माह की एकादशी के दिन से लोकपर्व 'गणगौर' समूचे प्रदेश में काफी धूमधाम से मनाया जाता है। मध्यप्रदेश के निमाड़ क्षेत्र में असल गणगौर पर्व माता की मूठ रखने से शुरू होता है यानी एकादशी के दिन अलग-अलग टोकनियों में मिट्टी एवं गोबर का खाद डालकर उनमें गेहूँ बोए जाते हैं। ये गेहूँ चार दिनों बाद यानी अमावस्या के दिन जब फूलकर अंकुरित हो जाते हैं तो इन्हें निमाड़ी में 'माता घुघरई गई' कहते हैं, जिसका मतलब होता है कि, अब गेहूँ अंकुरित होकर माता के जवारे का रूप लेने लगे हैं। और माता के इन्हीं जवारों के आने की खुशी में गेहूँ की घुघरी का प्रसाद बनाया जाता है। यह प्रसाद जिनके घर माता बोई जाती है, उनके द्वारा बनाया जाता है। गेहूँ की घुघरी बनाने के लिए सबसे पहले गेहूँओ को एक रात पहले पानी में भीग दिया जाता है। और अगले दिन सुबह जब यह गेहूँ फुल जाते हैं तब इन्हें गरम-गरम पानी में उबाला जाता है तथा पकने के बाद इनमें गुड़-घी मिलाकर घुघरी का प्रसाद पूरे गाँव में बाँटा जाता है। 

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