महिला दिवस's image
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कभी-कभी मैं माँ और मौसी की फोन पर घण्टो चलने वाली बातें बड़े ही ध्यान से सुनती हूँ। ऐसे तो इनकी बातें मुझे बड़ी रोचक, दिलचस्प व नई-नई जानकारियां प्रदान करने वाली लगती है लेकिन कभी-कभी इनकी बातों से मुझे रूढ़िवादी विचारों की बू आती है। इनकी इन बातों में मुझे किसी और चीज़ से ज्यादा समाज का भय अधिक नज़र आता है। इनकी ये बातें अक्सर मुझे यह अहसास कराती है कि, कैसे हमारा समाज बदलते दौर के साथ आगे बढ़ने की जगह अपनी वही पुरानी विचारधारा के चलते कहीं न कहीं पिछड़ गया है।
कुछ दिन पहले की बात है- मैं अपने फोन के नोटपैड पर आज के दिन के उपलक्ष्य में कुछ लिखने की कोशिश कर ही रही थी कि, तभी मम्मी के पास मौसी का फोन आता है- पहले तो वही माँ-मौसी वाली हल्की-फुल्की गपशप हुई, और फिर बीच बात में अचानक मम्मी मौसी से बोली, "बस, अबS जल्दी से भगवान ओखS एक छोटो सो लल्लो दइ द्". यानी, "बस, अब भगवान जल्दी से उसे एक छोटा-सा 'बेटा' दे दे।" उस समय बात जिसकी भी हो रही हो, लेकिन तब मुझे वहाँ एक शब्द काफी खटका, और वो है 'बेटा'!
बेटो में कोई बुराई नहीं है, और ना ही मेरी बेटो से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी है, लेकिन मुझे आपत्ति बस इस बात से हुई कि जब बेटा या बेटी देने का काम ईश्वर का है तो फिर हमारे परिवार की ये माताएं, ये क्यों तय कर रही है कि ईश्वर को क्या देना चाहिए क्या नहीं? वे ईश्वर का काम ईश्वर पर ही क्यों नहीं छोड़ देती? 
मैं आपको बता दूं कि, न तो ये दिन पहला है और ना ही माँ और मौसी द्वारा की गई ऐसी बातें! मैंने ऐसे कई दिन और रातें देखीं है जब माँ और मौसी इस तरह की बातें करती है। कई बार तो मुझे अपनी इन कानो-सुनी बातों पर विश्वास ही नहीं हुआ, और कई बार तो मैंने अपनी इन्हीं कानो-सुनी को सुनकर भी अनसुना कर दिया। आजकल तो मुझे जितना डर इस समाज से नहीं लगता, उससे कहीं अधिक डर तो मुझे माँ-मौसी की इन बातों से लगता है। कभी-कबार तो ये दोनों मुझे इसी समाज की कठपुतलियां नज़र आती है, जिन्हें यह समाज अपने इशारों पर नचाते हुए आए दिन इनसे ऐसी बेतुकी बातें करवाता रहता है। 
ये माएँ ये बात क्यों नहीं समझ पा रही कि एक इनकी ही सोच है जो इस समाज में बदलाव लाने का काम कर सकती है। यदि ये ही डर-डर कर इस तरह से समाज के बारे में सोचती रहेगी, तो ये समाज भी इन्हें अपने इशारों पर नचाता ही रहेगा।
कभी-कभी तो मुझे माँ की डाँट में भी समाज के सिखाए कुछ शब्द सुनाई पड़ते हैं। अक्सर ऐसा होता है कि मैं माँ की बहुत सी बातों से सहमत नहीं होती, तब हम दोनों के बीच की बात बस बात नहीं रह जाती, वो बहस का रूप ले लेती है, तब माँ मुझ पर चिढ़ते हुए सामाजिक शब्दों में कहती है कि "अभी खूब बोली ल्, दूसरा घर जायग नी तब पतो चलग"। और भी ऐसी कई बातें हैं जो माँ मुझसे कहती है, जैसे कि- "नी बेटा लोग गलत समझग या फोटो मत डाल। छोरो छे साथ मS, लोग काइ कSयग। लोग न् ख् बात बनाणS म् देर नी लगती हो..." और भी बहुत कुछ। 
मेरी माँ के शब्द तो ऐसे नहीं है, शायद समाज के ही दिए कोई शब्द है, जो माँ के मुँह से अक़्सर निकल जाया करते हैं। मेरी माँ तो एक सुंदर सरल बोली बोलती है, जो कि भय नहीं, बल्कि आत्मविश्वास पैदा करती है, किसी पर निर्भर नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर होना सिखाती है। मुझे समझ नहीं आता कि ये डरी हुई बातें, एवं डाँटे क्यों है, किसके लिए है? क्या हमारे सभ्य समाज के लिए?
जहाँ उस दिन मैं महिला दिवस के उपलक्ष्य में बेटियों के अधिकारों पर कुछ लिखने की कोशिश कर रही थी, वहाँ घर की महिलाओं द्वारा की गई ऐसी बातें मुझे आशंकित और निराश कर गई। ये तो मेरे घर की बात थी, लेकिन हमारे समाज एवं देश में ऐसी और कितनी ही माँ-मौसियां होगी जो हर दिन समाज के बारे में सोचती होगी, समाज की भाषा में ही बात करती होगी तथा समाज के ही लिए जीती होगी! अतः जब तक मैं इन मातृशक्तियों के मन से इस समाज का भय कुछ कम नहीं कर देती, तब तक किसी भी रूप में मेरे लिए ये दिवस मनाना औचित्यपूर्ण नहीं होगा। जिस भी दिन ये महिलाएं इस पुरुषप्रधान समाज से पूर्ण रूप से भयमुक्त हो गई, असल मायनों में वही दिन मेरे लिए 'महिला दिवस' होगा।




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