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परिचय


नाथेश्वर के लिए लोगों से तालमेल बढ़ाना, परिचय देना, परिचय लेना आम बात थी, जिसको वो खास ढंग से करता था।

’’ मेरा नाम नाथेश्वर है और मैं नाथ नगर में छोटे से घर में रहता हूँ। ’’

’’ मेरा नाम कृपाशंकर है और मैं कृपा बंग्लो में रहता हूँ। ’’

’’ तब तो आप पर हमेश कृपा बरसती रहती होगी ? ’’ ठहाका लगाकर दोनों ने गर्मजोशी से हाथ मिलाया।

नाथेश्वर ने कहा ’’ कभी आइए घर पे, संग बैठ कर चाय पिएंगे। ’’

’’ जी जरूर, लेकिन मैं सड़क पर हुए परिचय को सड़क तक ही रखने की कोशिश करता हुँ। ’’

’’ तो अंजान व्यक्ति आपके घर जाकर अपना परिचय देते हैं ? ’’ ठहाका अकेले नाथेश्वर जी ने लगाया और कृपाशंकर जी चुप रहे।

नाथेश्वर ने कहा ’’ ठीक हैं, फिर मिलेंगे। ’’

’’ जी नहीं, हमलोग नहीं मिलेंगे। ’’

’’ क्यों ? ’’

कृपाशंकर जी ने कहा ’’ एक परिचय तो आपने दिया ही नहीं। ’’

’’ क्या ? ’’

’’ यही की आपका जिससे परिचय होता है, उसके घर की कमियों परिचय सारे लोगों से हो जाता है। ’’

नाथेश्वर जी ने कृपाशंकर जी को एकटक देखा और कहा ’’ पर उनलोगों का जो अपना परिचय देते समय अपनी बड़ाई ज्यादा छाँटते हैं। ’’

दोनों को अपना परिचय आगे बढ़ाने में असहजता का आभाष हुआ और दोनों एक दुसरे से कभी भी नहीं मिले।


समाप्त






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