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खौफ के साए


आग की लपटों मंें शहर देखा है

खुद का भी जलता घर देखा है।

दरिन्दे सारे बासिन्दे थे यहीं के

सहमे हुए बोले, बस एक नजर देखा है।

ये तंज था कैसा, रंजिश थी कैसी

सब को दिल से उगलता जहर देखा है।

कौन मसीहा के नाम पर चिंगारी भड़का गया

दिलों के फुल मुरझाए, हाथों में खंजर देखा है।

बेघर हुए यतीमों का काफीला है यहाँ

तड़पते, भुख से बिलखते उन्हें, रात भर देखा है।


राजीव कुमार

बोकारो स्टील सिटी

झारखण्ड।


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