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हाँथो की लकीरो से तक़रार लिए बैठे है

जिंदगी जीने के हर औज़ार लिए बैठे है

हौशला है अभी बाकी मालूम हो जमाना

दुआओ की पतवार मझधार लिए बैठे है

कुछ देर ही सही अब जो सीखा है हुनर को

राकीबो के शहर में हम नकाब लिए बैठे है

मिट ही जाती ये हस्ती जो बता देते हर "राज"

हँसते है सारे आम दिल में गुबार लिये बैठे है

जख्मो की कमी न थी जो "राज" मिले हमको

पत्थर के हर टुकड़े को खुदा जान लिए बैठे है

मानिंद मेरे बर्बादी को अब कुछ लोग है बेताब

सुनाने को खैरियत यहाँ अख़बार लिए बैठे है

क्या मिटायेगी ये दुनिया जो तू साथ है मेरे

पहलु में तुम्हारे घर द्वार लिए बैठे है .......



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