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कविवर तुम्हारी कल्पना

Raj vardhan JoshiRaj vardhan Joshi March 23, 2022
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कविवर तुम्हारी कल्पना
साकार कब हो पाएगी
वो रूपसी वो प्रेयसी
आकार कब ले पाएगी
कब दिन ढलेगा स्वपनमयि
रात परिणय आएगी
होगा कभी संसर्ग क्वचित्
गंधर्व रूपा गायेगी
वो व्यंजना अभिव्यंजना
हो रंजना अतिरंजना
अतिशोक्तियां वो लक्षणां
अभिरंजना मनरंजना
सुर सरित सरोवर उपवन पवन
नीर धरती शशि रवि गगन
सब कुछ समर्पित कर दिया
उस बिंब को तुमने कवि
बस अक्ल ही है शेष अब
कभी वो भी मारी जाएगी।
'राज वर्धन जोशी'

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