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जब वक्त का चाबुक चलता है

Raj vardhan JoshiRaj vardhan Joshi March 14, 2022
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जब वक्त का चाबुक
चलता है
हर फर्द 
उखड़ने लगता है
संगेमरमर की दीवारों से
गर्द सा झड़ने लगता है
महलों दुमहलों में झुरमुट
दश्त सा उगने लगता है
घटने लगती है जब जब आमद
तब खर्च भी बढ़ने लगता है
पैदल हो जाता है इंसा
जब बल माथे पर पड़ता है।
पतझड़ हो जाता है सावन
मौसम जो मिजाज़ बदलता है
चलने लगती है सर्द हवा
तो दर्द उभरने लगता है
ढीला पड़ते ही कड़क बदन
हर नशा उतरने लगता है
चट्टानों के भी सीने से
झरना सा बहने लगता है।
'राज वर्धन जोशी'

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