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सगुण निर्गुण

Raj MishraRaj Mishra June 3, 2021
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देह की आसक्ति

सगुणोपासना है।

भोगलिप्सा निरन्तर बेचैन करती है

जलाती धमनियों,फैली शिराओं,

तन्तुओं को अहर्निश उत्ताप से।

एक पागलपन सदा ही

गूंजता है,ध्वनित होता है हृदय में

कामनाओं,वासना की तृप्ति तो

होती नहीं उपचार

अग्नि में घृत डालने से

और भी विकराल होंगी।


आत्मलीन

निर्मल मन वाला

दैहिकता से मुक्त व्यक्ति

निर्गुण को भजता ।

रूप और लावण्य

अर्थ खो देते हैं

जब अनासक्ति हो।

अलख निर॔जन मूलम॔त्र है

जो उन्मत्त किए रहता है

अनासक्ति का भाव लिए

दुख सुख सहता है

मन में परमान॔द समेटे

निर्विकार,उन्मुक्तचित्त

जीवन जीता है।










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