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अपनो के शहर से सपनों के शहर तक...♥️

राज कुं. राणाराज कुं. राणा August 8, 2022
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अपनों को छोड़ कर आया हूँ, मैं कुछ बनने आया हूँ..

वहाँ ऐश भी था आराम भी था, वो आराम छोड़ कर आया हूँ, मैं कुछ बनने आया हूँ..

वहाँ काम भी था और नाम भी था, वो नाम छोड़ कर आया हूँ, मैं कुछ बनने आया हूँ..

वहाँ आप भी थे, माँ बाप भी थे, माँ बाप छोड़ कर आया हूँ, मैं कुछ बनने आया हूँ..

वहाँ बातें थीं, नाते भी थे, नातों की गाँठ खोल कर आया हूँ, मैं कुछ बनने आया हूँ..

सपनों को जो आकार मिला, साकार मिला.. तो फिर से मिलने आऊँगा..

मैं कुछ बनकर आऊँगा ।

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