कविता's image
Share0 Bookmarks 0 Reads0 Likes

मैं रोज़ झड़ता हूं, उभरता हूं फिर भी बढ़ता हूं
ज़िंदगी जीता हूं, फना होता हूं, फिर चलता हूं ।

कई बरस बीत गए यूं ही चलते हुए
इस रेत के दरिया में ,
मिट्टी हूं बस मिट्टी बनकर पानी को तरसता हूं।

कभी छांव में, कभी धूप में , आंधी तूफ़ान में
मुझे बनाने वाले उस कुम्हार के, आंचल में जा ढलता हूं ।

मैं रोज़ झड़ता हूं, उभरता हूं फिर भी बढ़ता हूं
ज़िंदगी जीता हूं, फना होता हूं, फिर चलता हूं ।
बस इक 'राज' हूं खुदा का, उसी के रंग में रंगता हूं।

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts