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ग़ज़ल का शाइरी का ख़द्द-ओ-ख़ाल दो निकाल दो
ग़म-ए-हयात को सुख़न में ढाल दो निकाल दो

उरूज-ए-इश्क़ से गिराओ यूं न एकबारगी
मुझे ज़रूरी वक़्त-ए-ज़वाल दो निकाल दो

ग़म-ए-फ़िराक़ दिल की पिछली सफ़ में बैठा बच्चा है
इसे क्लास में कठिन सवाल दो निकाल दो 

कि कार-गह-ए-दिल से गर निकालना ही है मुझे
तो पहले मुझको मेरा 'ऐन-ए-माल दो निकाल दो

फ़िराक़ मौसमों में आँखें ख़ुश्क कब तलक रहें
कि अब तो आँसुओं को बर्शगाल दो निकाल दो

मुसव्वरी हो एक ज़िन्दगी की कैनवास पर
कि जिसमें सारे रंग-ए-मलाल दो निकाल दो

ये कह के उसने फ़ोन कट किया था आख़िरी दफ़ा
मिरा ख़याल दिल से तुम निकाल दो निकाल दो ।

~ वो फिर आएगी

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