ग़ज़ल's image
Share0 Bookmarks 130 Reads0 Likes
चाल कम थी दाब बढ़ता जा रहा था
मैं नदी में और गहरा जा रहा था

वो जो आया था नदी पर पुल बनाने
वो नदी के साथ बहता जा रहा था

फ़ोन कटना इक बहाना है सरासर
अस्ल में तो फ़ोन काटा जा रहा था

डोर रिश्तों की उन्होंने छोड़ दी थी
ज़ब्त याँ भी थोड़ा थोड़ा जा रहा था

रोज़ अपनी दूरियां बढ़ने लगीं थीं
यूनिवर्स अपना यूं फैला जा रहा था।

~ वो फिर आएगी

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts