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विश्वास और बेटियां

radheshyamjatiya5radheshyamjatiya5 October 31, 2022
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*विश्वास*


पास में मकान था, पडौसी था, इंसान था

उम्र में बड़ा था, बस इसीलिये सम्मान



एक दिन मौका देखकर, वो आ गया मकान में

गुड़िया ने हाथ जोड़े, खड़ी हुई सम्मान



बेटा कहा, बैठा रहा, उलझाये रखा बात

पिता तुल्य बातें कहीं, कुछ प्रसाद रक्खा हाथ में



उस भोली बिटिया को वो, प्यारी सी बातें भा गई

आदर में, सत्कार में, प्रसाद को वो खा गई



चक्कर खा कर गिर गई, वो फर्श पर अफसोस

कुछ ही पलों की दूरी पर लड़की हुई बेहोश थी



रिश्तों में उलझाके था, रिश्तों को कोई ठग

धरती हुई बेचैन मानो, चाँद था सुलग गया



मानवता के मुँह पे था, ताला सा मानो लग

एक गिद्ध मानो माँस को था नोचने सा लग गया



एक दो घड़ी पहने तलक जिसके लिये सम्मा

इंसान नहीं, इंसान के ही भेष में हैवान था



पुतलियाँ फिरी हुई थी जान में ना जान

लड़की नहीं थी लाश थी, जिंदा थी पर बेजान थी


लग रहा था मानिये रोंदी गई तितली कोई

रिश्तों पर अपनत्व पर हो आ गिरी बिजली को



काल का काला कहर मानो कली को खा

एक दो घड़ी के बाद में था होश उसको आ गया


खून से लथपथ थी वो कपड़े नहीं थे जिस्म

एक प्रश्नवाचक चिन्ह था भगवान के अस्तित्व प



ऐ लड़‌कियों एक मशवरा है गाँठ तुम बाँधो अ

हद से ज्यादा भूलकर विश्वास ना करना कभी!



नाम राधेश्याम जटिया

भदेसर जिला Chittorgarh

(राजस्थान)

Mob 7615985803

radheshyamjatiya5@gmail.com

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