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जज़्बात और देशभक्ति

radheshyamjatiya5radheshyamjatiya5 November 3, 2022
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*हुआ कुछ यूं* 

हुआ कुछ यूँ के हम चल तो पड़े सफर पर,
मगर मंजिल फरेबी थी ये ठिकाना बदलती रही
 वो पिस्तौल सी आँखें' जिन्हें मासूम जाना था.. 
वो हर एक गोली पर अपना निशाना बदलती रही

शमा जलती थी जलती है और जलती रहेगी भी, 
बस शम्मा तो शम्मा है ये परवाना बदलती रही।

किसी के खातिर मुझसे ज्यादा खुद को कौन बदलेगा?
 उसने जब- जब भी चाहा मुझको मनमाना बदलती रही।

ए माँ मिल जाये मुझको तुजसा कोई चाहने वाला
 भूखी रहकर भी मेरी फरमाइशों पर खाना बदलती रही

मेरे भारत की मिट्टी के भी तो महबूब लाखों हैं -- 
रही बस लाल से रंगी चाहे दीवाना बदलती रही

गंदी राजनीती के लिये यारी ना तोड़ो यार 
बेवफा थी ये सदियों से बस चोला बदलती रही

किराए के मकानों पर जो अपना रौब दिखाते थे
भूखा शेर थी ये मौत बस निवाला बदलती रही

अगर मैं छोड़ दूँ लिखना तो यहाँ सैलाब आ जाये, 
कलम जब जब भी उट्ठी है ये जमाना बदलती रही।।


नाम राधेश्याम जटिया
भदेसर जिला चित्तौड़गढ़
(राजस्थान)
Mob 7615985803
Gmail radheshyamjatiya5@gmail.com

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