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अजनबी सा हर शख़्स है यहां रहता

Rabindra Kumar BhartiRabindra Kumar Bharti December 31, 2022
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अजनबी हर शख़्स है

और अंजान हर रहगुज़र यहां

हर तरफ हीं भीड़ है

और शोर में सिसकती तन्हाई

कि कोई किसी की नहीं सुनता

बस कहने को अपने-पराये हैं

सारे हीं हैं हमसफ़र

कहीं उदास की उबासी

कहीं खुशियों की ख़ुशबू

कहीं दिल तक हैं ख़ंजर

कहीं शूलों ने निभाई है रंजिश

कि हर आईनों में शीशे बिखरे हैं

लेकिन हर शख़्स ख़ामोश है

बस कभी-कभी ख़ामोशी से

बेबसी अश्क में ज़मीं तक आती है

मगर मुश्किल से अल्फाज़ यहां

है कोई जाया करता

कि अजनबी सा हर शख़्स

है यहां रहता।

© रविन्द्र कुमार भारती

#rabindrakbharti

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