बिच्छू का डंक's image
Story4 min read

बिच्छू का डंक

Raaj basant AazadRaaj basant Aazad December 2, 2021
Share0 Bookmarks 32 Reads0 Likes

'बिच्छू का डंक'


"तुम घरै जा मम्मी। मैं देखौं तो या कित्तो बड़ो साँड़ बनो फिरत है। आज मैं यखै ठठरी बार कै रह्यों। अपने बाप को अही तो आव हाथ लगा कै दिखा तैं मोहों। मैं हेंईं थाँड़ी हौं खोर मा।" मोहल्ले के बड़े बुजुर्ग उसे समझाते हैं कि "बिटिया होकै इत्तो लड़बो ठीक नोंहो।" उनकी नज़र में यह अपराध ही नहीं बल्कि पाप है और अपशब्दों का इस्तेमाल करना तो महापाप है। लेकिन ऋचा तो ठहरी महापापिन उसे तो ऐसे पाप हर दिन करने पड़ते हैं क्योंकि उसने गलत को बर्दाश्त न करने की कसम जो खाई है। जब सभी के प्रवचन सुनते-सुनते उसके कान चीखने लगे तो वह दहाड़ उठी "या...चालीस साल को जौन साँड़ खड़ो है जेखै बिटिया मोये बराबर है वा मोहो रंडी-हरजाई कै गारी देत है दाई-महातारी करत है येहे शरम नईं आऊत आ। या कया...पुन्य को काम आय..? जब येहे इत्ते बड़े ढूढुर का शरम न्हाँय तो मऊँ का न्हाँय। मोसे उरझँय से पहले आदमी का दस दइयाँ सोच लओ चहिए। अगर कौनो मोहो दस गारी दये तो मैं बीस दैहों ऊपर से अतकारी और।" ये गाली गालौच उसकी ज़िंदगी का अब एक हिस्सा बन चुका है। सब उसे 'बिच्छू का डंक' कहकर चिढ़ाते हैं। और यह उपनाम उसकी प्रकृति के अनुसार ही रखा गया है। इस उपनाम के प्रतिक्रिया स्वरूप चिढ़ाने वालों को "तोर नाश हो जा,बसवारा,ठठरी बरै। तोर सातौं जनम न बने,तोहों करिया डस ले।" ये सब सुनने को मिलता था जोकि केवल ज़बान से कहे शब्द मात्र थे दिल से दी बद्दुआ नहीं। क्योंकि उसके दिल से कभी भी किसी के लिए भी बद्दुआ नहीं निकलती थी। अपने अभी के जीवन में उसने बहुत मार खाई है। वह इतनी मार खा चुकी है कि उसे अब किसी भी तरह की मार से डर नहीं लगता। रात में शराब के नशे में धुत्त अपने पिता की मार से अपनी माँ को बचाना और कभी पिता को मोहल्ले वालों को गाली देने पर उनकी मार से बचाना मानो ये सब जैसे उसकी दिनचर्या का हिस्सा हों। उस रात उसकी सभी उम्मीदों पर पानी फिर गया जब भाई भी शराब पीकर घर आया। घर आते ही उसने बड़े रौब के साथ गुर्राते हुए कहा कि ऋचा खाना लगा। वह भला कहाँ किसी से दबने वाली उसने भी साफ कह दिया कि वह खाना नहीं लगाएगी। कहीं इन दोनों में लड़ाई न हो जाए यह सोचकर उसकी माँ ने कहा कि जा खाना परोसकर दे दे। वह इसके बावजूद भी टस के मस न हुई और दहाड़ते हुए बोली "अगर या शराब पीके अए तो मैं खाना लगाकै न दैहों। तुम्हार लड़का आ तो तुम द्या पर मैं न दैहों।" उसका भाई जैसे ही हाथ उठाता है उसे मारने के लिए वह झट से हाथ पकड़ लेती है और अपने गुस्से को पीते हुए आँखें तरेरकर उसने कहा "सुन,जादा तेहा न देखाव। तैं मोहों मरहे तो मोर कुछु न जए पर मैं तोहों मरहों तो तोर इज्ज़त चई जए। कहे से बड़ो भाई अगर छोटी बहन का मार ओ दए तो कौनो बड़ी बात नोहों लेकिन छोटी बहन अगर बड़े भाई का मार दए तो पूरे गाँव मा प्रचार हो जाँ खाँ हैं।" उस रात के बाद ऋचा का भाई शराब पीकर घर तो नहीं आया पर बाहर भी नहीं पीता है यह कोई नहीं कह सकता। वह सोचती है कि बाक़ी लड़कियों की तरह वह भी चुप रहने की कोशिश करेगी किसी से नहीं उलझेगी लेकिन परिस्थितियाँ उसे ऐसा करने से रोक लेती हैं क्योंकि एक वही तो है जो उनका डटकर मुकाबला कर सकती है। किसी को भी मुँह तोड़ जवाब दे सकती है। छोटे से लेकर बड़ा हर कोई उसे 'बिच्छू का डंक' कहता है कभी मज़ाक में तो कभी गुस्से में पर कोई भी उसके अंदर की पीड़ा को समझ नहीं पाता। 


No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts