विचार – प्रवाह ,३'s image
Article1 min read

विचार – प्रवाह ,३

R N ShuklaR N Shukla October 4, 2022
Share0 Bookmarks 156 Reads0 Likes
प्रा 0 पाठशाला के दिन भी क्या थे !
प्रत्येक शनिवार अन्ताक्षरी ! 
पूछ-पूछ कर सुन्दर कविताएं , चौपाईयाँ , दोहे , सवैये आदि रट-रट कर जाते थे। बचपन की याद की हुईं कविताएं उच्च कक्षाओं से लेकर जीवन–परीक्षाओं के क्षेत्र में भी काम आती हैं।
पटरी , कापी –किताब पर रेंगने वाले कीटों को विद्या माता कह कर सावधानी पूर्वक हटाकर उन्हें हाथ जोड़कर 
प्रनाम करने का उपदेश गुरूजी द्वारा प्राप्त होता था जिसमें जीव-हिंसा रोकने का आग्रह था ।
आज कैसे दिन आ गए ! 
आज पुस्तकों पर पैर भी रखने में संकोच/भय नहीं है।
ऐसी प्रवृत्ति से विद्या नहीं आती ! विद्या-प्राप्ति हेतु गुरू का आदर - सम्मान के साथ ही पुस्तक सम्मान से विद्यार्जन में अभूतपूर्व सफलता मिलती है।

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts