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उद्वेलित मन

R N ShuklaR N Shukla November 11, 2022
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ओ समंदर की लोल लहरों से खेलती हवाओं !

मेरे तपते दिल से क्यों खेलना चाहती हो ?

खिड़कियां बन्द कर लूँ या तुम्हारे संग बह जाऊँ ? 

तुम्हें भरलूँ बाहों में या मधुस्वर में गाऊँ ? 

फिजाओं में घुल जाऊँ या मन के सितार छेडूं ?

बहारों के तराने गाऊँ , कोकिल कलकंठ सुनाऊं ?

या तेरे प्यार में डूबकर अपना अस्तित्व मिटाऊँ ? 

प्यार की सुखद स्मृतियों में डूब जाऊँ   –

या आधी खुली खिड़की से  खड़े-खड़े 

बादलों संग लुका-छुपी खेलते चंदा निहारूँ ?

क्या करूँ ? किससे कहूँ ?  कहाँ जाऊँ ?

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