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ऊब चुकी हूँ मैं !

R N ShuklaR N Shukla March 8, 2022
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उब  चुकी  हूँ  मैं !

हर  रोज  के  

चौके–चूल्हे से–

थक  चुकी  हूँ  मैं !

चलो ले चलो मुझे वहाँ–

जहाँ सूरज की पहली 

अनछुई किरण धरती को

प्यार  से  छूती  हो !

मुझे ले चलो वहां –

जहाँ हरे-भरे पर्वतों से

निर्झर झरते हों !

मुझे  ले  चल  वहाँ –

जहाँ दुर्गम पहाड़ों से नदियां –

स्वयं पथ-निर्माण हों करतीं

कल-कल छल-छल ध्वनि करतीं 

लक्ष्यप्राप्ति कीओर

अनवरत आगे बढ़तीं...

मुझे   तुम   ले   चलो –

किसी निर्जन कानन में 

जहाँ पंक्षियों के जोड़े

प्रेमालिंगन करते हों

मुझे  ले चलो  वहां –

इस कोलाहल से  दूर –

किसी जनहीन प्रान्त में

जहाँ सिर्फ़ मैं…और तुम

दोनों  सम्मुख  बैठे 

इक दूजे केआंखों में,आंखें डाले

एक निश्छल प्रेम कहानी रचते

आपस में मुस्काते रहते !

ले चलो वहाँ– उन तारों के उस पार...

जहाँ से पुनः कभी ना वापस आयें !









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