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तुम कहाँ हो माँ !

R N ShuklaR N Shukla May 7, 2022
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चलते - चलते ,

तुझे  ढूंढते-ढूंढते 


थक चुका हूँ  मैं !


तूने मुझे  जहाँ  फेंका  होगा 


उस  जगह  की  है  तलाश मुझे !


तुम कहाँ  हो  माँ ?


मैं  तेरे प्यार की 


बदनसीब   निशानी   हूँ 


एक बेनाम जीवित कहानी हूँ 


जानता  हूँ  मुझे  फेंकते हुए 


तू   बहुत   रोई   होगी !


न जाने कितने दिन-रात 


तू   नहीं  सोई  होगी 


तू भी तो मेरी तरह 


जिंदा लाश बनी –

कहीं फिर रही होगी ?


कहाँ होगी ! कैसे  होगी ! 

 
कैसी तेरी सूरत  होगी ?


मेरी  तरह  तू  भी 


कहीं ग़ुम सुम


जिंदगी  को  ढ़ोती  होगी ।


ये  सोच सदा घबराता हूँ, 


तुमसे मिलने का प्यासा हूँ  !


तुम  कहाँ  हो  माँ  ?

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