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" सन् १९८७ की बात "

R N ShuklaR N Shukla May 10, 2022
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यही सन् '१९८७' की बात !
शहर का नाम–इलाहाबाद !

प्राचीन नाम की –
गरिमा से मण्डित !
आज का प्रयागराज !

कुछ मन में गुनता चल रहा था...
जिंदगी की दशा और दिशा की
तलाश में  ! 

विश्व-विद्यालय से आनंद भवन की ओर 
धीरे–धीरे बढ़ते कदम ..
जीवन का आनंद लेने या ढूंढने–
जीवन का पथ ! 

और फुटपाथ ....
उस पर सोईं , कुछ जगीं हुईं 
आड़ी तिरछी रेखाओं जैसी
बेतरतीब मासूम–मजलूम
जिंदगियाँ !

बहुमूल्य पुस्तकें ! कौड़ी के भाव !
जिनमें कितने सुन्दर अनमोल भाव !
और गर्द – ओ – ग़ुबार में सनी !

और बस !  एक आह ! फिर –
आहों का दौर... कराहों का सिलसिला...

उन निर्दोष जिंदगियों ! पवित्र पुस्तकों !
लेखकों और कवियों की दुर्दशा !

जी भर आया !
जिम्मेदार कौन ?

जिनमें संरक्षित हैं – 
मानव – भूगोल !
सभ्यताओं के क्रमिक –
प्रामाणिक इतिहास !
और सुमङ्गल विचार–भाव !

ना जाने कितनों को 
जीवन का लक्ष्य दिया, 
शोभन-सा  पथ दिया !
उन पुस्तकों ने !
सर्वोत्तम सीख दिया
है : पथ : है :  .....

पर ;
परवा किसे ?
उन विगलित जनों की  !
लेखकों और कवियों की !
धूलचाट रही  पुस्तकों की !
पर , यहाँ –
समुचित प्रबन्ध है–
महलों के कुत्तों की !


 

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