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' निर्मल - मन ' बनें

R N ShuklaR N Shukla May 5, 2023
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पियत सुमन रस अलि बिटप , कोल काटि फल खात ।
तुलसी  तरु–जीवी  सकल , सुमति  कुमति  कै  बात ।।
    गोस्वामी तुलसी दास – 'दोहावली'
कोल स्वार्थवश वृक्ष को ही काट देता है । मधुप, बिना क्षति पहुँचाए , वृक्ष से रस ग्रहण कर लेता है। दोनों ही तरुजीवी हैं। कुमति और सुमति में यही अंतर है । कुबुद्धि तो स्वार्थी है , जबकि सद्बुद्धि अपने साथ - साथ परहित में रत रहती है ।
मनु मलीन तन सुंदर कैसे ,
विष रस भरा कनक घट जैसे । (गोस्वामी जी)
अर्थात् –
सोने के घड़े में 'विष' सुशोभित नहीं होता । स्वर्ण-कलश में तो अमृत ही सुशोभित होता है ।

अतः मानव-मन,  सुंदर भावों और उत्तम विचारों से भरे रहने से ही शोभा पाता है । गन्दे और निकृष्ट भावों - विचारों से तो हानि और अपयश ही मिलता है।

भगवान श्रीराम ने स्पष्ट कहा है –
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। 
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।। (गोस्वामीजी)

अतः "निर्मल–मन" बनें ।

डॉ शम्भुनाथ सिंह जी भी लिखते हैं –

सोन हँसी हँसते हैं लोग ,
हँस-हँस कर डसते हैं लोग ।।

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