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मातृ-शक्ति !

R N ShuklaR N Shukla March 8, 2022
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हे मातृ शक्ति !

तुमको मेरा शत् शत् प्रनाम !

पुरुसत्व-मोह के दुरभिसंधियों को

तुमने कितना झेला!

न जाने कितने ही अतिचारों को

 हँस - हँस  के  रेला-ठेला !

सबके हितार्थ ही तेरा सुन्दर कर्म अहो !

हम नहीं समझ सके तेरा अनुपम धर्म अहो !

जिनके भी लिए तूने, जीवन का दान  किया !

उन लोगों ने तुमको, यह कैसा प्रतिदान दिया !

तेरे विभीषिकामय जीवन को लख कर–

मन करता रहता है अपने से प्रश्न सदा !

हे नर ! तू कैसे इतना  कामान्ध बना ?

नित करता ही रहता नारी का शील भंग !

फिर करता क्यूँ है नारी पर, इतना विमर्श ?

अपने घृणित कुकर्मों का कर त्वरितअन्त !

तेरे इन कलुषित व्यवहारों से मनुष्यता हो रही क्षुब्ध !

प्रायश्चित कर! प्रायश्चित कर ! प्रायश्चित कर !

नारी है तेरी माँ समान ! देर न कर अब क्षमा माँग !

'माँ' है यह, सब कुछ सह लेगी, तेरे सभी पा हर लेगी !

पाकर उससे क्षमा-दान ! पापों का करले अभी अन्त !

अपने को करले धन्य-धन्य!जीवन में ला दे तू बसन्त !

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