मानव-धर्म's image
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कभी किसी का 
दिल मत तोड़ो !
पथरीली राहों से –
कभी भी मुँह मत मोड़ो !

कभी मन को –
उजाली रात बनाकर तो देखो !
उजली चाँदनी में –
कभी नहाकर तो देखो !

प्रकृति के'मौन-स्वर'में–
कभी अपना  स्वर 
मिलाकर तो देखो !
मन के सारे –
चक्रव्यूह औ' व्यूह टूटेंगे
मुरझाए  मन में  तेरे -
नव आशा के सुमन खिलेंगे !

जीवन की , राहों पर चलते -
पथ के सारे, काँटों को चुनते  
दिशाहीन व दृष्टिहीन को -
पथ दिखलाते– चलते-चलते 
मन को अति संतोष मिलेगा
मानव होने का धर्म निभेगा !


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