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ख़ामोश ज़िन्दगी

R N ShuklaR N Shukla January 11, 2022
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घटती उम्र! बढ़ती तृष्णाएं!
मौन हो चलती रहती है 
जिन्दगी!

भीतर ही भीतर 
कभी बर्फ-सी जमती है
कभी पिघलती  है तो–
किसी सूरत-ए हाल में–
महक कर बहक जाती है
जिंदगी!

एक अनाम द्वंद्व को चुप-चाप
ढ़ोती हुई जीती-जाती है,
कभी हँसती है,कभी गाती है, तो
कभी रो-रोकर पागल हो जाती है
जिन्दगी!

जैसे शाम ढ़ले–
वैसे ही ढ़लती है
ज़िन्दगी!
डूबते सूर्य को– 
मानो अर्घ्य देती हुई–
अपलक निहारती 
अपने कर्मों का लेखा-जोखा
लगाती है जिंदगी!

तब याद आने लगते हैं किये कर्म!
अच्छाईयाँ  बुराईयाँ  और  जुर्म!
और अन्ततः पछतावे के सिवा–
कुछ भी हासिल,कर नहीं पाती है
जिंदगी! और–
ख़ामोश हो जाती है 
जिंदगी!

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