गीता वंदन!'s image
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काव्यमयी 'कविते' हो तुम!

अन्तर्मन की 'सरिते'हो तुम!

हे गीते!तेरा स्वर पाकर

धन्य हुआ मेरा जीवन!


जीवन में कितना विष घोला

विषधर बनकर डसता ही रहा

जीवनभर पापाचार किया

पापी बनकर घूमता रहा

जीवन का कुछ ना अर्थ रहा

दिशाहीन ही जीवन,मेरा बना रहा...


मेरे उद्भ्रांत जीवन को–

तुमने ही सुन्दर लक्ष्य दिया

तेरा आशीर्वचन प्राप्तकर–

पहचाना जीवन-अमृत-रस!

भीतर की पशुता अहंकार !

सब मिटा चला

करता रहता तेरा अर्चन!


अब सु-सुन्दर!कृति देता हूँ

हे गीते! तेरा स्वर, भरता हूँ!!

             


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