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दीप ! यह बुझने न पाए !

R N ShuklaR N Shukla October 24, 2022
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दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं !

यह हृदय का दीप है ,
दीप ! यह बुझने न पाये !

ज्ञान का आलोक लेकर 
सत्य भावों को जगाकर
विषमभावों को भगाकर
जल ! अचंचल ! दीप मेरे 
सुपथ - मार्ग प्रशस्त कर दे

अज्ञानता के निविड़ तम में
ज्ञान – ज्योति  प्रपात  बन 
सम्पूर्ण वसुधा जगमगाये 
दीप ! यह बुझने न पाए !

२ 
आस का दीपक जलाए 
दीप  आँचल में  छुपाए
चल पड़ी वह प्रेम के पथ
मन  को  धीरज  बँधाए 
दीप ! यह बुझने न पाए !

चंद्र की वह चन्द्रिका है 
प्रेम की  आराधिका  है
चल पड़ी है  वह ! अकेली
चाहेभी कितना विघ्न आए !
एक ही  लक्ष्य  उसका 
एक ही संकल्प उसका
यह हृदय का 'दीप' है
दीप ! यह बुझने न पाए !!

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