'दरिद्र'स्त्री के सपने!'s image
MotivationalPoetry1 min read

'दरिद्र'स्त्री के सपने!

R N ShuklaR N Shukla February 5, 2022
Share0 Bookmarks 176 Reads0 Likes
हाड़ कँपादेने वाली 

जाड़े की सर्द रातें !

पुआल बिछे जमीन पर

गुदड़ी में लिपटी ठिठुरती हुई

दरिद्र स्त्री!

साँसों की गर्मी से

तन को गर्म करने का

असफल प्रयत्न करती हुई

नींद की प्रतीक्षा में –

करवटें बदल-बदलकर

पूरी रात काट देती है

मखमली सपनों के –

गर्म गलीचे पर बैठी, 

सोचती हुई–

सुंदर दिन! आएगा!

सपने पूरे होंगे पर, कब ?

हर साल वही सर्द-भरी रातें!

वही सुंदर-मीठे सपन–

आते हैं जाते हैं, पर–

शेष रह जाती हैं –वही

ठिठुरन से भरी जाड़े की रातें!

जैसे तैसे कटता आया है जीवन!

और,अचानक किसी दिन–

लोगों ने सुना– वह चली गई! 

बहुत दूर! बहुत दूर.....

वापस न आने के लिए–

इस स्वर्ग-सी धरती पर!

और, अपने पीछे छोड़ गई–

अपने दर्द के निशान!

एकअनुत्तरित प्रश्न बनकर

वे दर्द अब भी जीवित हैं–इस धरा पर–

झोपड़ी !  पुआल ! गुदड़ी ! बोरसी !

और–उसके सुंदर मीठे-मीठे सपने !!





No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts