बेटियाँ और वो's image
Poetry2 min read

बेटियाँ और वो

R N ShuklaR N Shukla September 29, 2022
Share0 Bookmarks 245 Reads1 Likes
उनकी झल्लाहट !

मन को कर देतीं हैं आहत ! 

उनकी –– वे  हिचकियाँ !

कर  देती  हैं––  मर्माहत !

दुःख- दर्द देखा नहीं जाता !

कलेजा मुँह को आ  जाता !


वो कोई और नहीं , 

वो हैं हम सब की

अपनी ही बेटियाँ !

नारी स्वातंत्र्य के 

इस युग में भी कैद हैं –

बंदिशों की सलाखों में !

वो जीती हैं आज भी 

दहशत  के  सायों  में !


बाजार –– हाट   या   हों –

कालेज के विस्तृत परिसर !

सामाजिक या अन्य विभाग !

सर्वत्र  उपस्थित गुरुघण्टाल !


जी सर ! यस सर ! कहतीं

नो सर  ! नहीं कह सकतीं

हरक्षण सहमी-सी रहती

कुलिश सदृश तीक्ष्णतर ! 

शब्द – शरों से बिंधती !

उन्हें घूरतीं  वहशी नजरें 

उन वहशी नजरों से बचती

कुछ नहीं कहती –

गोली जैसे चलती ......


वातावरण ! अति उत्श्रृंखल !

अति निर्मम !  भीषण !  भयाक्रांत !

पथ, कदम-कदम अति दुःसह साध्य !

आहत है –– मन !


गुरु – गंभीर कहर !

उठते जीवन का प्रथम प्रहर !

फिर भी वह बिटिया –

बुध–कर्म कुशल !

उच्चाकांक्षा हृदय में भर !

जीवन के पथ बढ़ चली निडर 

बढ़ चले कदम प्रगति-पथ पर ..


उठी  नजर  विस्तृत  नभ पर

उड़ चली भ्रांति का तज गह्वर !

मन में अदम्य साहस को भर !

बह सुरसरिता – सी , अविरत !

ढ़ह गए बन्ध -तटबंध सभी

जब दमभर कर मुठ्ठी भींची !


पथ है :   दुर्गम  !

साहस :  अदम्य !

स्वयं अभिवर्धित–

मन !

कस लिया कमर !

बढ़ चले कदम ...

अब समझ चुकी 

सब कुछ है –

उसके ही करतल !







No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts