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अक्षरों में उलझे मन के जज़्बात!

R N ShuklaR N Shukla October 8, 2021
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अक्षरों में उलझे

मन के जज़्बात

शायद! कभी पढ़ पाते?

मजलूम जिंदगी की

आँखों की भाषा!

कभी समझ पाते?


एक दिन व

एक दर्द-भरी रात

जिसको सहना–

कितना मुश्किल-भरा

होता है काम!

जिसने समेटे हैं

पूरी कायनात!



इसमें मजबूर आम आदमी के

दास्तान-ए-जिंदगी की–

पूरी किताब!

शायद हम पढ़ पाते!

तो–

हमारा हो जाएगा मोह भंग!

चकाचौंध-भरी जिंदगी से।


कितना अच्छा होता...

आँधियों के संग

साहस से लड़ते–

तिनकों की औकात में-

छिपी उनकी युद्ध-कला

कभी जान पाते!



उसी दिन हम,

अपने साहस-अस्तित्व की

कहानी स्वर्णाक्षरों में–

लिख जाते!!

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